कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच और भी गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
यहाँ रोटी मांगने वाले को भिखारी नाम मिला है,
दहेज मांगने वाले इज्जतदार कहलाएं हैं,
एक बेटी के बाप से,
दहेज मांगना अब आम हो गया है,
इंसानियत का चोला शायद कहीं खो गया है,
बडी शान से दहेज लेते हैं,
कभी जरूरत का नाम देकर,
कभी खुद आगे होकर,
कभी बेटे का बाप बनकर आए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
यहाँ रोटी मांगने वाले को भिखारी नाम मिला है,
दहेज मांगने वाले इज्जतदार कहलाएं हैं,
* * * * *
दहेज लेने की दौड़ में
एक दुल्हन के बाप से,
हम एक-दूसरे से आगे जा रहें हैं,
जिस खेल का कोई अंत नहीं है,
हम आँखें बंद करके,उस खेल में भागे जा रहे हैं,
मुख पर ना रखते हैं, दिल में हाँ होती है,
हर चीज का रखते हिसाब हैं,
जितना ऊँचा बनाया है मकान,
उतना ज्यादा लेते हैं दहेज का सामान,
हर आदमी के चेहरे पर,दो-दो नकाब हैं,
कभी अपनी उँची शान का जलवा बिखेरा है,
कभी अपने बेटे के पढ़ाई के खर्च गिनवाए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
* * * * *
मनपसंद हो खाना-पीना,
इज्जत मिले हर बाराती को,
चाँद सा मुख हो,गहनों से सजी हुई,
ऐसा अपना जीवन साथी हो,
कायदे-कानून हैं दिखाने के लिए,
सफेद हो गया हमारा रक्त है,
पेड़ों के पत्ते गिरने का भी एक वक्त होता है,
लेकिन इंसान के गिरने का ,
सच में, होता नहीं कोई वक्त है,
हमने अपने लालच के,
सब पत्ते खोलकर दिखाएं हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
* * * * *
सर पर सितारों वाला दुपट्टा है,
मेरे हाथों की मेंहदी का रंग लाल है,
समझ नहीं आता है किस से पूछूं,
मेरे मन में उठ रहे कंई सवाल हैं,
सौंप दिया है अपने जिगर का टुकड़ा,
सीने पर पत्थर रखकर एक बेटी के बाप ने,
आपके घर की रौनक बना दिया है,
अपने घर की रौनक को,
आंसू बहाते हुए एक बेटी के बाप ने,
दहेज दिया है और बेटी भी,
किसी ने मन की पूछी है,क्या दुल्हन के,
एक बाप का दिल रो पडता है,
जब भी बेटी ने आंसू बहाए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
* * * * *
इंसानियत का उजला चेहरा (ujla chehra) : एक आवाज़

मैं बेटी हूँ पढ़ी-लिखी,
कोई खिलोना नहीं बाज़ार का,
मेरा जीवन साथी बनने का हक उसे ही होगा,
जिसे चाव नहीं है किसी और उपहार का,
मेरे हाथ थामने का उसे ही अधिकार होगा,
मेरे जीवन का वो ही पहरेदार होगा,
जिस इंसान ने दहेज के खिलाफ,
तन-मन से अपने कदम बढ़ाए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
यहाँ रोटी मांगने वाले को भिखारी नाम मिला है,
दहेज मांगने वाले इज्जतदार कहलाएं हैं,
* * * * *
खुशियों के पल डाले हैं हमारी झोली में,
इस जहां से चुन-चुन कर,
बेटियां लगती है बोझ की तरह,
बडे हुए हैं बचपन से ये सुन-सुन कर,
कड़वा है लेकिन सच भी तो है,
बाप के सर पर बोझ की तरह हैं,
जब तक बेटियां बाप की दहलीज पर हैं,
एक बाप ने हंसते-मुस्कुराते हुए,
बाप होने के सब फर्ज निभाए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच और भी गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
यहाँ रोटी मांगने वाले को भिखारी नाम मिला है,
दहेज मांगने वाले इज्जतदार कहलाएं हैं,
* * * * *
दहेज का दानव मुंह फैलाए खडा है,
बाप निभा रहा है अपने हिस्से के फर्ज,
लेकिन अंदर से थोड़ा-थोड़ा डरा है,
बेटियों को ही पहल करनी होगी,
दहेज के खिलाफ जलानी होगी मशाल,
दहेज बिन भी जिंदगी हो सकती है खुशहाल,
स्वागत है उस लडके का,
जो दो जोडी कपड़ों में ,
दुल्हन को लेने आए हैं,
कहीं खो सा गया है आजकल,
इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra),
हर दिल में हो गया है लालच गहरा,
कलयुग के इस दौर में,
लालच ने पंख फैलाए हैं,
यहाँ रोटी मांगने वाले को भिखारी नाम मिला है,
दहेज मांगने वाले इज्जतदार कहलाएं हैं,
* * * * *
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