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(ualajh gai jindagi)

उलझ गई जिंदगी (ualajh gai jindagi) संवार दो ना माँ

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उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो ना माँ,
परेशानियों के समंदर से,जिंदगी की नांव,
हाथ पकड़ कर निकाल दो ना माँ,
तेरी बेटी बिल्कुल,अकेली रह गई है,
रब जाने,क्यों मुझे छोड़कर,
एक सच्ची सहेली चली गई है,
एक दिन चुपके से आकर मेरे सिरहाने,
अपना वो ही प्यार उडोल दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
*          *         *          *          *

बड़ी माँ के सहारे,बस चल रही है जिंदगी,
वो रब के आगे सर झुकाकर,
मेरे स्वस्थ रहने की,खुश रहने की,
हर दिन करती रहती है बंदगी,
वो मेरे आस-पास ही रहती है,
मुझे समझाते हुए कहती है,
वो दिन नहीं रहें हैं तो ये भी नहीं रहेंगे,
हम उसकी मर्जी मानकर जिएंगे,
वो ही निकालेगा हमे दुखों के भंवर से,
हमारी प्यार से पकड़कर बांह,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
*          *         *          *          *
जो हमारे हाथों से छूट गया है,
उसे तो हम वापिस नहीं ला सकते हैं ,
लेकिन हम हार मानकर नहीं जिएंगे,
झूठी मुस्कान मुंह पर चढ़ाकर रखती है,
वो कितनी दलेर है मुझे दिखाकर रखती है,
मुझे डर लगता है माँ,रात के काले अंधेरे से,
मैं रात को सहम कर उठ जाती हूँ,
हवा से,खिडकीयों के खड़कने से,
मैं यहीं हूँ तुम्हारे आस-पास,
एक बार मुझे ये बोल दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
परेशानियों के समंदर से,जिंदगी की नांव,
हाथ पकड़ कर निकाल दो ना माँ,
*          *         *          *          *
ये किस जन्म का हिसाब बाक़ी था,
जो इस जन्म में चुकाकर चले गए हो,
मुझे एक बार आकर बताओ,क्यों माँ
सब-कुछ अपने सीने में छुपाकर चले गए हो,
आपने किया था वादा,मुझे डोली में बिठाने का,
आपने किया था इरादा,अपने हाथों से,
मुझे दुल्हन की तरह सजाने का,
तुम झूठी हो माँ,जो अपना वादा ना निभा सकी,
हाँ माँ,आप बिल्कुल झूठी हो,
जो अपनी जिम्मेदारी ना उठा सकी,
मैं कैसे उठाऊंगी घर की जिम्मेदारी,
मुझे आकर समझा दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
*          *         *          *          *

उलझ गई जिंदगी (ualajh gai jindagi) संवार दो ना माँ  :  अपना प्यार दे दो

 

 (ualajh gai jindagi)
(ualajh gai jindagi)

अकेले दुनिया से चले जाने का,
आपको किस ने दिया ये हक माँ,
अपनी फूल सी बेटी को,
रोता-बिलखता छोड़कर जाने का,
आपको किस ने दिया ये हक माँ,
आज फिर से,मेरे गले में बचपन की तरह,
अपनी बाहों का हार डाल दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
परेशानियों के समंदर से,जिंदगी की नांव,
हाथ पकड़ कर निकाल दो ना माँ,
*          *         *          *          *
मैं हर दिन बातें करती हूँ माँ,
दीवार पर लगी तुम्हारी तस्वीर को देखकर,
क‌ईं बार खुद से ही नफ़रत होने लगती है,
मुझे अपनी तकदीर देखकर,
आपने पूरे घर को संभाल लिया था,
पापा के अचानक से चले जाने के बाद,
हम-सबको,गम के समंदर से निकाल लिया था
पापा का साथ छूट जाने के बाद,
मुझे बीच राहों में छोड जाने का,
आपकों किस ने हक दिया है,
किस के हाथों में हमारे जीवन का रथ दिया है,
आप हमारे आसपास रहती हो,
इस बात का कोई प्रमाण हमें दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
*          *         *          *          *
आपने हमें माँ और पापा,दोनों का प्यार दिया है
बड़ी माँ का हमेशा आपने,
दिल से आदर-सत्कार किया है,
एक घाव और मिला है,
अभी पहला भरा नहीं था,
एक फूल और मुरझा गया है,
अभी पहला फूल पूरी तरह से खिला नहीं था,
सपने में ही सही,एक बार आ जाओ माँ,
अपनी प्यारी सी सूरत दिखला जाओ माँ,
हमारी सोई हुई तकदीर का दरवाजा,
अपने हाथों से खोल दो ना माँ,
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi),
एक बार आकर संवार दो ना माँ,
बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह,
एक बार आकर संभाल लो  ना माँ,
परेशानियों के समंदर से,जिंदगी की नांव,
हाथ पकड़ कर निकाल दो ना माँ,
*          *         *          *          *
Creater -राम सैणी
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