दहेज का दर्द ( Dahej ka dard ) : एक बाप की बेबसी
दहेज का अंत भी कभी होगा क्या, इसके बिना नहीं हो सकती,क्या बेटी विदा, ये बख्शीश नहीं है रब […]
दहेज का अंत भी कभी होगा क्या, इसके बिना नहीं हो सकती,क्या बेटी विदा, ये बख्शीश नहीं है रब […]
मेरी कोख के जाये का सवाल था, शायद ये नए ख़ून का उबाल था, माँ बताओ तुम्हारे एहसान है
पापा के सीने पर मैं बचपन में, बेख़ौफ़ होकर सो जाया करती थी, पापा का सीना (papa ka seena)था, मेरे
मायके सा ससुराल ( mayke sa sasural) मिला है, परिवार एक दम खुशहाल मिला है, बढ़-चढ़ कर ससुराल की बातें
मुझे ढूंढने से भी नहीं मिलेगा, इस दुनिया में पिता के जैसा चित्रकार, वो है मेरे लिए सारा संसार
दूनिया की सबसे सुंदर रचना माँ ( Sabse sundar rachana-maa) तूं हर घड़ी यूं ही हंसना माँ, जब तूं
मेरे पास आओ बड़ी माँ, थोडा नीचे झुक जाओ बड़ी माँ, मैं कुछ कहना चाहती हूँ आपसे अकेले में, मेरी
मैं मनाना चाहता हूँ बड़ी हर्षो-उल्लास से, अपनी माँ का जन्मदिन ( maa ka janmdin ) धूमधाम से, मैं मनाना
मुझे कोई प्यार नहीं करता है, चेहरा देखकर सबका पता चलता है, ये सब देखती मैं हर रोज हूँ, जो
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना, ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है, उनके चेहरे