दहेज का कर्ज (Dahej ka karz) : पिता का बोझ
मेरे दहेज के फरनिचर का रंग उतर गया लेकिन मेरे बाप के सिर पर दहेज का कर्ज (Dahej ka karz) […]
मेरे दहेज के फरनिचर का रंग उतर गया लेकिन मेरे बाप के सिर पर दहेज का कर्ज (Dahej ka karz) […]
दौलत-शोहरत सोच रहीं हैं, धीरे-धीरे चलतीं हुई हमें छूना है उस घर की चौखट (ghar ki choukhat ) को, जिस
मै सोच रही हूँ कल रात से पापा, मुझे पुछनी है आपसे एक बात है पापा, मुझे जाना है बाजार
सारे जहां से खुशियां चुराकर, मैं भर देता बेटी के माथे की लकीरों में, उसके नसीब में सिर्फ खुशियाँ (
आँखों में शर्म स्वभाव नर्म, चेहरे पर मोहिनी मुस्कान ( mohini muskan ) रखता है, बातों में जादू,जुबां पर काबू,
अपने दुपट्टे के एक कोने में, खनकते सिक्के बांधकर रखती है, एक छोटा-सा मिनी बैंक ( minni bank ), मेरी
काला रंग ( kaala rang ) है ईश्वर की रचना, हर घड़ी बस ये ही मानकर हंसना, वो लोग होते
मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए सासु माँ बस अपनी बेटी बनाकर रख लेना, मुझे मेरी माँ की तरह थाम लेना
सब करते हैं मेरा अभिवादन, मुझे हर पल बांझ बोलकर, मैं पी जाती हूँ ये कड़वे घूंट ( kadve
मैं कैसे उतारूंगा बड़ी माँ, कर्ज इस जादुई स्नान ( jadui sanan ) का, आपके प्यारे हाथों से नहाना, आपके