उलझ गई जिंदगी (ualajh gai jindagi) संवार दो ना माँ
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi), एक बार आकर संवार दो ना माँ, बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह, एक
उलझ गई जिंदगी(ualajh gai jindagi), एक बार आकर संवार दो ना माँ, बिखर गई हूँ टूटकर तिनके की तरह, एक
कहीं खो सा गया है आजकल, इंसानियत का उजला चेहरा,(ujla chehra), हर दिल में हो गया है लालच और भी
मैंने बोल दिया है गर्म हवाओं को, मुझसे दूर होकर गुजर जाना, मेरी माँ का जादुई हाथ (jadui hath) है
मैंने भी कर ली है तैयारी पापा, मुझे भी करनी है हाथी की सवारी(hathi ki savari), हाथी आने वाला है
पापा के बचपन का कोई किस्सा सुना दीजिए, जो बात आपके दिल को छू गई हो बड़ी माँ, वो बात
मुझे बड़ा आदमी बनाया है पढ़ा-लिखा कर, पिता का गुरुमंत्र (pita ka gurumantar) मैंने जीवन में रखा है अपनाकर,, जहाँ
बचपन के किस्से-कहानियों में, एक किस्सा मेरी नानी के घर का है, नानी के घर की खुशबू (nani ke ghar
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है, आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर, तुम्हारा
रब की कृपा से मिली है, मुझे दो प्यारी सौगात (do pyari saugat), अच्छा हमसफ़र और संस्कारी औलाद, मैं हाथ
श्याम तक काम करते-करते, माँ की पीठ थकावट से टूटी होती है, शनिवार हो या रविवार,धूप हो या छाँव, माँ