बुढापे में रोटी ( budape me roti) : बचपन के संस्कार
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना, ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है, उनके चेहरे […]
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना, ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है, उनके चेहरे […]
हमारी नानी का आंगन(Nani ka aangan ), सच में नानी की तरह महान है , नानी के घर में हमारी
माँ से सीखा है प्यार जताना, रिश्तों में मीठापन भी, प्यार बाँटते चलो ( pyar bantate chalo ) हंसकर मिलो
माँ का मॉर्निंग अलार्म ( maa ka morning alarm ) बजने लगा है, उसके कदम इधर-उधर चलने लगें हैं, जल्दी
मेरे दहेज के फरनिचर का रंग उतर गया लेकिन मेरे बाप के सिर पर दहेज का कर्ज (Dahej ka karz)
दौलत-शोहरत सोच रहीं हैं, धीरे-धीरे चलतीं हुई हमें छूना है उस घर की चौखट (ghar ki choukhat ) को, जिस
मै सोच रही हूँ कल रात से पापा, मुझे पुछनी है आपसे एक बात है पापा, मुझे जाना है बाजार
सारे जहां से खुशियां चुराकर, मैं भर देता बेटी के माथे की लकीरों में, उसके नसीब में सिर्फ खुशियाँ (
आँखों में शर्म स्वभाव नर्म, चेहरे पर मोहिनी मुस्कान ( mohini muskan ) रखता है, बातों में जादू,जुबां पर काबू,
अपने दुपट्टे के एक कोने में, खनकते सिक्के बांधकर रखती है, एक छोटा-सा मिनी बैंक ( minni bank ), मेरी