पिता का गुरुमंत्र ( pita ka gurumantar): बुलंदियों का रास्ता
मुझे बड़ा आदमी बनाया है पढ़ा-लिखा कर, पिता का गुरुमंत्र (pita ka gurumantar) मैंने जीवन में रखा है अपनाकर,, जहाँ
मुझे बड़ा आदमी बनाया है पढ़ा-लिखा कर, पिता का गुरुमंत्र (pita ka gurumantar) मैंने जीवन में रखा है अपनाकर,, जहाँ
बचपन के किस्से-कहानियों में, एक किस्सा मेरी नानी के घर का है, नानी के घर की खुशबू (nani ke ghar
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है, आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर, तुम्हारा
रब की कृपा से मिली है, मुझे दो प्यारी सौगात (do pyari saugat), अच्छा हमसफ़र और संस्कारी औलाद, मैं हाथ
श्याम तक काम करते-करते, माँ की पीठ थकावट से टूटी होती है, शनिवार हो या रविवार,धूप हो या छाँव, माँ
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ, ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ, हर दिन
जिस मंदिर के दरवाजे कभी बंद नहीं होते उस मंदिर का देवता पिता होता है , पिता है परिवार की
हर दिन खाने में नकल उतारता था, हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था, मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal
चाँद की तरह है शीतल स्वभाव, दिलों में शीतलता बिखेरने का काम मिला है, अपनी जादुई मुस्कान से सबका मन
मैंने मांगी है एक मन्नत, माँ की हंसी(maa ki hansi)से हो, हमारा प्यारा घर रोशन, हंसता हुए मिले सदा मेरी