माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
माँ तब से मरती है मुझ पर,
मैं जब से उसकी यादों में,उसकी बातों में,
एक धुंधली सी तस्वीर बनकर दिखता था,
मैं था पानी का एक बुलबुला,
जिसे माँ ने मुझे अपने लहू से सींचा था,
उस दिन से लेकर अब तक,
माँ का हर पल उंगलियों पर गिनकर बीता था,
वो तब से जागती है मेरे लिए,
मैं जब से सपने में आकर,
माँ के सीने पर खेलता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
* * * * *
मेरे चारों ओर अंधेरा था,
वो पानी का बुलबुला घर मेरा था,
ना रात का मुझे कोई अनुमान था,
ना सूरज की किरणों से उजला कोई सवेरा था,
माँ के दाने-पानी पर,मेरा नाम लिखा था,
मेरे दिल की दीवारों पर,
बस माँ का नाम छपा था,
मुझसे बातें करती थी माँ,
अपने हाथों से छूकर,
मुझे अध्यात्म का पाठ पढ़ाती थी,
वो अध्यात्म की बातें सुनाकर,
माँ तब से जानती है मुझे,
जब मैं घर की दीवारों पर लगी,
तस्वीरों में हंसता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
* * * * *
वो चलती थी जब संभल-संभल कर,
मैं पहचान लेता था उसके कदमों की आहट से,
कुछ खाती थी कुछ भूखी रहती थी,
वो मेरे लिए पता नहीं क्या क्या सहती थी,
मैं जान लेता था माँ की घबराहट से,
माँ जब बिस्तर पर होती थी,
वो धीरे-धीरे करवट लेती थी,
अपने कोमल से हाथों से,
माँ हर घड़ी मुझे गर्माहट देती थी,
एक दिव्य रौशनी मेरी ओर,
कुछ पल के लिए आती थी,
मैं देखकर बहुत खुश होता था,
जब भी मुझे ये खूबसूरत मंजर दिखता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
* * * * *
माँ मेरा हाल-चाल पूछती रहती थी,
मन की आँखों से छूकर,
वो मुझे लाड लढाती रहती थी,
अपनी यादों में बसाकर,
वो हर क़दम रखती थी,देखभाल कर,
मुझे अपनी जान से ज्यादा रखती थी,
हर पल माँ संभाल कर,
वो बार-बार अध्यात्म की बातें करती थी,
माँ के साथ-साथ मेरी भी सांसें चलती थी,
वो करवटें बदलती रहती थी ,
तुम्हें कोई तकलीफ़ तो नहीं है,
माँ अपने अंतर्मन में कहती थी,
माँ तब से जानती है मुझे,
जब में उसे सपनों में आकर मिलता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
* * * * *
एक लकीर (Ek lakeer) से जीवन तक : जन्म से पहले का प्यार

माँ चेहरे पर हंसी बिखेर कर रखती थी,
अपने दिल पर मेरा नाम उकेर कर रखती थी,
मैं हंसुगी तो वो हंसेगा,माँ को पता था,
माँ के चेहरे की दिव्य आभा से,
मेरे चेहरे पर चमक आएगी,ये माँ को पता था,
माँ मेरे नाम की खैर झोली में डाल देती थी,
जब भी घर के दरवाजे पर,
कोई फकीर दिखता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
माँ तब से मरती है मुझ पर,
मैं जब से उसकी यादों में,उसकी बातों में,
एक धूंधली सी तस्वीर बनकर दिखता था,
* * * * *
मैं देखुंगा जब माँ का मुख,वो सवेरा कब आएगा,
शायद जल्दी ही मिलने वाला है,
मुझे माँ की ममता का सुख,
ये अंधेरा भी छंट जाएगा,
दिन गुजर रहें हैं एक प्यारी सी उम्मीद में,
बरसने वाला है मुझ पर माँ का प्यार,
एक प्यारी सी उम्मीद है,
मै गोल-गोल घूमकर बता देता हूँ,
मैं बिल्कुल ठीक हूँ माँ,
मै भी माँ का स्पर्श पाकर,
फुलों के जैसे खिलता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
* * * * *
वो पहला आलिंगन,पहली लोरी,
मुझे मिलेगी एक दिन माँ,
आपके प्यारे आँचल में पनाह,
मेरे आस-पास रहोगी ना माँ,
उस रब की तरह,
मुझे अपने सीने से लगाओगी ना माँ,
उस रब की तरह,
मेरे लिए हर बार प्रार्थना करती थी,
जब भी रब के आगे,माँ का सिर झुकता था,
माँ तब से जानती है मुझे
मैं जब प्रैगनेंसी सटीक पर ,
एक लकीर(Ek lakeer)बनकर दिखता था,
माँ तब से मरती है मुझ पर,
मैं जब से उसकी यादों में,उसकी बातों में,
एक धूंधली सी तस्वीर बनकर दिखता था,
* * * * *
Creater- राम सैणी
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