Last updated on July 8th, 2026 at 06:25 pm
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
बेटे का दोष देखने से पहले,
किसी की बेटी की ओर भी नजर दौडाना,
ये हालात बने उस वक्त,
जब किसी बेटी का बहु बनकर,
हमारे परिवार में हुआ है आना,
बेटा फस गया है मझधार में,
उसी को दोषी माना है इस संसार ने,
एक हाथ से ताली नहीं बजती,
दुसरे हाथ का भी उतना ही साथ है,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
* * * *
बचपन से लेकर जवानी तक का सफर,
माँ के आँचल में बिताया है,
रिश्तों की अहमियत है क्या,
ये माँ ने हमें बताया है,
एक छत के नीचे हम सब ने,
मिल -बांटकर खाया है,
ना तेरा था ना मेरा था,
जो भी माँ ने दिया प्यार से,
उसको ही सिर-माथे से लगाया है,
माँ को माना है धरती माँ,
पिता को माना आकाश है,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
माँ की सूरत देखकर,
दिन शुरू होता था हमारा,
हर दिन माँ की डांट खाकर,
दिल खिलता था हमारा,
मात-पिता हैं ठण्डी छाँव,
हमारा दिन शुरू होता है छूकर उनके पाँव,
मात-पिता का सदा रहूँ मैं बनकर
ये हर बेटे के दिल के जज्बात हैं
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
घर में जब आए बहू बेटी बनकर,
वो रहती है घर में सबकी पहली पसंद बनकर,
खुशियों के उस महोल में,
सबके रंगीन चेहरे लगते हैं,
रंग खुशियों के देखकर,
सबके हसीन चेहरे लगते हैं,
फिर कुछ दिन बाद उसके चेहरे से,
एक नकाब हटता है,
फिर दिल में दबी नफ़रत की चिंगारी,
लपटों का बवंडर बनकर दिखता है,
फिर होती है माता-पिता पर,
गमों की बरसात है,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ): घर का असली धन

धीरे- धीरे सबके चेहरे मुरझाने लगते हैं,
जब बहू-बेटा अपने रंग दिखाने लगते हैं,
जो बेटा हुआ करता था,
मात-पिता का सबसे खास,
आज उसी ने कर दिया हैं,
अपने माता-पिता को उदास,
उनकी आँखें भीग जाती है ये सोचकर,
ऐसे तो कभी ना थे जो,
आज हमारे घर के हालात हैं,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
बोझ लगने लगा है अब मात-पिता का साथ,
बेटे के पीछे रंग दिखाने लगे हैं,
घर की बहू के हाथ,
जो बसते थे कभी बेटे के दिल में,
पहले दिल से अलग किए फिर घर से,
मात-पिता अपने ही घर में,हो गए अनाथ,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
एक पल में हो गए बेघर से,
अपने ही घर में रहने लगे,बेगानों के जैसे,
हर चीज पराई लगने लगी है,मेहमानों के जैसे,
कब से अरमान था बहू-बेटे संग वक्त बिताने का ,
एक ही घर में चूल्हे अनेक क्यों,
दोष बहू-बेटे एक जैसा,
तो फिर दोषी एक क्यों,
मात-पिता हैं परिवार का असली आधार,
ये जो हमारा जीवन है ये उनकी ही दी सौगात है ,
बिन मात-पिता के हर घर अनाथ है,
दोष नहीं किसी एक का (dosh nahin kisi ek ka ),
मात-पिता को अलग करने में,
अपने बेटे से पहले,किसी की बेटी का भी हाथ है,
* * * * * * *
creater-राम सैणी
Read more emotional poetry
Click here–> मेरी जीवन संगिनी (jeevan sangini) : प्रेम से सजा रिश्ता
Click here–> पिता भी इंसान हैं(pita bhi insan hai) : बरसता हुआ पिता



