सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में हर रोज बनते हैं साहुकार,
मै पैसे गिन रहा था,नई गाडी में चल रहा था,
मुझे साहब कहकर पुकार रहे थे,
हमारी गली के हवलदार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
* * * * *
गेट कीपर गेट खोलने वाला था,
मुझे नमस्कार बोलने वाला था,
मै उस पर रौब जमाता हूँ हर दिन,
आज भी रौब जमाने वाला था,
काला कोट गले में टाई,
मुझसे बातें करती है मेरी परछाई,
आज महीने का आखिरी दिन था,
चमक रहा हमारा कैबिन था,
एक कोने में महक रहे थे फूल खुशबुदार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में हर रोज बनते हैं साहुकार,
* * * * *
मैं सबको पैसे बांट रहा था,
थोड़ा-थोड़ा सबको डांट रहा था,
सब कर्मचारी आ रहे थे आँखें झुकाकर,
मैं नीचे की ओर देख रहा था मुस्कराकर,
डरे-सहमे से सब बोल रहे थे,
झुकी हुई नजरों से कुछ तोल रहें थे,
धीरे से किसी ने खटखटाया है,
शायद कोई मुझसे मिलने आया है,
माँ तुम सामने खड़ी थी छडी लेकर,
जब खोला मैंने गाड़ी का द्वार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में बनते हैं हर रोज साहुकार,
* * * * *
दो महीने से ये ही चल रहा है,
ये सुहावना मंझर मेरे हाथों से निकल रहा है,
मैं बड़ा बनकर जीना चाहता हूँ ,
हर दिन मखमल पर सोना चाहता हूँ,
कुछ गुजर गई है कुछ गुजर जाएगी,
माँ धीरे-धीरे उम्र तुम्हारी,
कुछ दिन बाद माँ तुम देखना,
इस दरवाजे पर रुकेगी एक नई गाड़ी हमारी,
लोग देखने आएंगे बनाकर लंबी कतार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में हर रोज बनते हैं साहुकार,
* * * * *
सुबह की फटकार (subah ki fatkar) : सपनों का साहूकार

तूं फूली नहीं समाएगी,
जब अमीर बेटे की माँ कहलाएगी,
गली-मोहल्ले में हमारी बातें होंगी,
सातवे आसमान पर हमारी आँखें होंगी,
तुम्हारे हाथों में नोटों की गड़ियां होंगी ,
चाँदी के गिलास में पानी तुम पीना,
सोने के चम्मच से खाना तुम खाना,
बड़ी मैडम कहेंगे तुम्हें सब रिश्तेदार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में हर रोज बनते हैं साहुकार,
* * * * *
ज्यादा ऊँचा मत उड़ आसमान में,
सुबह-सुबह ना मुझे ज्ञान दे,
ये किस्से-कहानियां अपने पापा को सुनाना ,
मेरे आगे नहीं चलेगा हर रोज नया बहाना,
अब जल्दी से उठ जाओ,
सारे पशुओं को नहलाओ,
अच्छे कर्म करने से ही होंगे,
तुम्हारे सब सपने साकार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में हर रोज बनते हैं साहुकार,
* * * * *
अपने सर पर ठंडा-ठंडा पानी गिराना,
अपने पापा से तेल की मालिश कराना,
बहुत जोर लगता है सपने देखने में,
आज से भुखे पेट तुम सोना,
अपने बिस्तर पर पानी डालकर सोना,
तब जाकर छुटकारा मिलेगा इस बिमारी से,
अब बच्चे बनना छोड़ दो,
अपने पापा से कुछ सीख लो,
अब तुम्हें काम लेना चाहिए समझदारी से,
रोज-रोज मुझे भी अच्छा नहीं लगता,
तुम को सुबह-सुबह लगाना फटकार,
सुबह-सुबह मत जगाया कर माँ,
मुझे अच्छी नहीं लगती है,
तुम्हारी सुबह की फटकार (subah ki fatkar),
सुबह की नींद सुहावनी लगती है,
हम सपने में बनते हैं हर रोज साहुकार,
* * * * *
Creater- राम सैणी
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