कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
उस दिन दिल खोलकर तारीफ़ की,
मेरी जली हुई रोटियों की,
अपने पापा से शायद ऐसे ही,
शाबाशी मिलती होगी,
हर घर में बेटियों को,
कुछ रोटियों पर अनोखे चित्र छपे थे,
मेरी माँ सोच रही थी मेरी ओर देखकर,
ये कोई पिछले जन्म में अनोखा चित्रकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
मेरे पापा मेरी बनाई रोटियों को,
बडे चाव से खाते हैं,
कभी रोटी पर अचार रखकर,
कभी रोटी का रोल बनाकर,
कभी खाते थे तो कभी मुस्कराते हैं,
मैने पूछा पापा से थोडा डरकर,
कितना आनंद आया पापा मेरी रोटी खाकर,
माँ जैसी रोटी बनाने में अभी थोडा वक्त लगेगा,
उस कला को अपनाने में अभी थोडा वक्त लगेगा,
थोडी जलना,थोडी टेढ़ी-मेढ़ी होना,
अभी रोटियों का बरकरार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
पापा बोले मेरे सर पर हाथ रखकर,
वो बोले मेरे हाथों को छूकर,
ऐसे लगा ये रोटी मेरी माँ ने बनाई है,
हर रोटी में मेरी माँ की मूरत समाई है,
हर निवाले में एक अपनापन था,
हर निवाले में एक मीठापन था,
पहली बार में इतनी प्यारी रोटियां बनाना,
जैसे कोई ईश्वर का चमत्कार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
मेरी बड़ी माँ ने मेरी रोटियों को देखकर,
दूर से ही मुझे प्रणाम किया,
अभी पहला ही निवाला खाया था की,
उनका पूरा मुंह ही छिल गया,
मेरे हाथो की बनाई रोटियां,
मेरी बड़ी माँ की तरह थोड़ी सख्त होती हैं,
मेरी बड़ी माँ के हिसाब से वो बहुत मोटी होती हैं,
मेरी मीठी जुबान की तरह मेरे पापा को,
मीठ लगती है मेरे हाथों की रोटियां,
मेरे पापा नहीं निकालते हैं,
हर बात पर मेरी गलतियां,
बड़ी मां को मेरी गोल रोटी का इंतजार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
मेरी पहली रोटी ( pahli roti ) : पहली रसोई का पहला उत्सव

मेरी बड़ी माँ मुझे दिखाती है,
मेरी टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां,
बेल की तरह बढ रही है हर रोज़,
कब बनाएगी गोल-गोल रोटियां,
मेरी छोटी बहन मेरी रोटियों को देखकर,
बार-बार निकालती है अपनी जिव्हा,
मेरी रोटियों को सारे घर में घूमाती है,
अपनी उंगली में डालकर मेरी छोटी बहन दिव्या,
उस दिन का नजारा कितना मजेदार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
गोल-गोल रोटियां कैसे बनती हैं,
उनमें थोडी ज्यादा मेहनत लगती है,
माँ हर बार समझाती है,
मै बडे गौर से देखती हूँ,
जब माँ रोटी बनाती है,
धीरे-धीरे अब मेरी रोटियां,गोल बनने लगी हैं,
धीरे-धीरे अब मेरी रोटियां,
सबको पसंद आने लगी हैं,
हमारा रसोईघर मेरी गोल रोटियों से,
अब होने लगा खुशबुदार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
मेरा एक छोटा भाई बहुत नकलची है,
उसकी भोली-भाली सी शक्ल भी है,
अब तो उसे भी मेरी रोटी भाने लगी है,
मेरी बनाई रोटी खाकर,
उसके चेहरे पर भी रौनक छाने लगी है,
सबसे ज्यादा मेरा हौसला,मेरे पापा बढाते हैं,
वो हर रोज मुझसे ही रोटी बनवाते हैं,
अब तो जब भी घर में रोटी बनती थी,
मेरा नाम लिया जाता हर बार था,
कुछ कच्ची कुछ पक्की,थोडी जली हुई,
कुछ रोटियों का टेढ़ा-मेढ़ा आकार था,
मेरी पहली रोटी ( pahli roti )को बडे चाव से खाया,
ये मेरे पापा का मेरे लिए पहला उपहार था,
* * * * * *
creater-राम सैणी
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