( Dahej ka dard )

दहेज का दर्द ( Dahej ka dard ) : एक बाप की बेबसी

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दहेज का अंत भी कभी होगा क्या,
इसके बिना नहीं हो सकती,क्या बेटी विदा,
ये बख्शीश नहीं है रब से मिली हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
बेटी के हाथ पीले करते-करते,
हमें माँ के जैसे पेट पालने वाली जमीन,
हमारे हाथों से छूट गई है,
क्या फिर से छू पाऊंगा उस मिट्टी को,
अब तो ये उम्मीद भी टूट गई है,
अब दिल को झूठी तसल्ली देनी होगी सदा,
दहेज का अंत भी कभी होगा क्या,
इसके बिना नहीं हो सकती,क्या बेटी विदा,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *
बेटी के रुप में बहू संस्कारी हो,
मुख की वाणी उसकी प्यारी हो,
ये किसी सौगात से कम नहीं है,
रिश्तों-नातों की कदर हो,
घर के छोटे-बड़े की फ़िक्र हो,
ये किसी सौगात से कम नहीं है,
दहेज का दर्द पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसने बेगाने हाथों में सौंप दिया है,
अपने घर की रौनक नाजों से पली हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *
हर आदमी का कद छोटा हो जाता है,
बेटी के बाप से दहेज मांगकर,
उसकी आँखों का‌ आकार मोटा है जाता है,
एक बेटी के बाप को झुकाकर,
अपने सीने पर पत्थर रखकर,
बेटी को एक बाप विदा करता है,
अपनी हैसियत से बढ़कर,
बेटी को एक बाप दहेज देता है,
आँखों में आंसू होते हैं एक बाप के,
बेटी को विदा करते हुए,
जो रहती थी घर में फुलों के जैसे खिली हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *
मैंने रब से मांगा है हाथ जोड़कर,
मेरे खेत-खलिहान में बढ़-चढ़कर,
हर साल कमाई हो,
उसी मेहनत की कमाई से,
मेरी बेटी की विदाई हो,
उस मिट्टी से हम सबको,
पेट भरकर खाना-पीना नशीब हो,
मैंने अपनी जान से भी बढ़कर रखा है,
अपने पूरकों की जमीन को,
इस जमीन को माँ की पदवी है मिली हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *

दहेज का दर्द ( Dahej ka dard ) : एक पिता का संघर्ष

 

( Dahej ka dard )
( Dahej ka dard )

 

मन छोटा हो जाता है ये सोचकर,
घर कैसे चलेगा अपनी जमीन बेचकर,
मैं हर दिन अपनी मिट्टी को चूमता हूँ,
अपने हाथों में लेकर उसे प्रणाम करता हूँ,
मैं अपनी मिट्टी पर हर सुबह नंगें पैर चलता हूँ
उसके प्यार को अपने मन में महसूस करता हूँ,
सोचकर भी डर लगता है,
उस दिन क्या होगा हमारा,
जिस दिन ये मिट्टी हमारे हाथों से चली गई है,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *

दहेज प्रथा की इस बुराई में हर आदमी शामिल हैं,
इस बुराई को छोडना क्यों लगता मुश्किल है,
ये है एक गरीब बाप पर आफत ,
राम जाने कब बनेगा दहेज़ मुक्त भारत
दिल में हर आदमी के काला चोर है,
कभी परम्परा का नाम देकर,
कभी बेटी की जरूरत का नाम देकर,
दहेज ना मिलने पर आज भी,
चिड़ियों के जैसे मचाता शोर है,
बहू चाहिए सर्वगुण संपन्न,
दहेज के बिन दिल में है खालीपन,
वर पक्ष वाले हैं इस अभिमान से सर ऊँचा है,
चाहे आँखें हैं शर्म से झूकी हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,

* * * * * *
बाहर से अमीर पर दिल का गरीब है आदमी,
बिन संस्कार के कैसे हंसी होगी जिंदगी,
इस समस्या का बातों से नहीं पहल से हल होगा,
तब कहीं जाकर सुनहरा कल होगा,
आँखें बंद की हुई हैं जानबूझ कर,
सच क्या,ये सबको है पता ,
दहेज का अंत भी कभी होगा क्या,
इसके बिना नहीं हो सकती,क्या बेटी विदा,
ये बख्शीश नहीं है रब से मिली हुई,
दहेज का दर्द ( Dahej ka dard )पूछो उस बेटी के बाप से,
जिसका खेत-खलिहान भी चला गया,
बेटी भी चली गई ,
* * * * * *
creation -राम सैणी
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