(main kitna badal gaya hoon)

मैं कितना बदल गया हूँ (main kitna badal gaya hoon) माँ

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हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
अब जो मिलता है खा लेता हूँ,
अपना मन बहला लेता हूँ,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
अब कौन उठाएगा मेरे नाज-नखरे,
कभी-कभी याद आ जाते हैं,
बचपन के वो ख्याल भूले-बिसरे,
अब समय से मिले या आगे-पीछे,
बस खा लेता हूँ आँखे मिर्चें,
अब शिकायत नहीं शुक्रिया करता हूँ,
हर मिलने वाले को हंसकर मिलता हूँ,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
*      *         *        *         *
अनगिनत रास्ते हैं जीवन के,
हर कोई सपने देखता है,
अपनी-अपनी मंझिल के,
सुबह की मीठी-मीठी नींद मुझे भी प्यारी है माँ,
लेकिन घर में सबकी खवाइसे पूरी करने की,
अपने कांधों पर जिम्मेदारी है माँ,
मैं तो पानी को भी छानकर पीने वाला था,
मैं तो बस अपनी ही दुनिया में जीने वाला था,
कभी  घर से दूर ना निकलने वाला,
आज ना चाहते हुए भी रह लेता है,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *
जब से जिम्मेदारियों का एहसास हुआ है,
जीवन का गुजरता हर लम्हा खास हुआ है,
पहले आचार के साथ रोटी बडे शौंक से खाते थे,
अब ना चाहते हुए भी खा लेते हैं,
पहले थोडा सा बोझ उठाने से भी डरते थे,
आज हद से ज्यादा भी उठा लेते हैं,
जिम्मेदारियों की डोर बडी लंबी है,
हमारी इच्छाएं बडी ही सतरंगी हैं,
पहले अकेला चलने से भी डरता था,
तुम्हारी उंगली पकड़कर घर से निकलता था,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *
घर से बाहर रहना मुझे भी अच्छा नहीं लगता है,
लेकिन जीवन नौका तो चलानी है ना,
हर बात में हाँ-हाँ करना,
मुझे भी अच्छा नहीं लगता है,
लेकिन थोडा जुबां में रस घोलकर चलती है,
ये जो हमारी जिंदगानी है ना,
कभी बारिश के दिनों में खुशी से नहाते थे,
वो भी एक प्यारा वक्त था,
आजकल पसीने से ना चाहते हुए भी नहाते हैं,
ये भी एक प्यारा वक्त है,
जो कभी थोडी गर्मी सहन नहीं कर सकता था,
आज उसने गर्मी से भी दोस्ती कर ली है,
आसमान को कैसे छूना है,
अब इस बात की हट जो कर ली है,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *

मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ :बचपन से जिम्मेदारी तक

 

(main kitna badal gaya hoon)
(main kitna badal gaya hoon)

सर्दियों के दिनों में हाथ काम नहीं करते थे,
कभी ये बोलकर चल जाता था,
पर आज कुछ अलग बात है,
सारा-सारा दिन बाद सेंकते हुए निकल जाता था,
पर आज कुछ हालात अलग है,
कभी फरमाइशों की झडी लगाते थे,
छत पर हर दिन पतंग उड़ाते थे,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *
हम खा रहे हैं दाना-पानी,
जहाँ-जहाँ का लिखा हुआ है,
हर दिन नीली छतरी वाले का,
हम नाम लेकर उठा रहे हैं,
जहाँ-जहाँ बिखरा हुआ है,
मुझे मेरी हैसियत से बढ़कर मिला है,
हमारा अंदर-बाहर से घर भरा हुआ है,
प्यार बांटा है तो प्यार मिल रहा है,
सफलता की ओर हमारा हर कदम बढ रहा है,
कभी छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ होने वाला,
जैसे आज नाराज होना भूल गया है,
मै कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *
नफ़रत के सब धागे अब टूट ग‌ए हैं,
जलन,घूटन के बेवजह के सिक्के,
अब बहुत पीछे छूट गए हैं,
नजर धीरे-धीरे हो रही है पारखी,
क्योंकी माधव है अपने जीवन का सारथी,
जरुरतमंद से कुछ ज्यादा ही लगाव है,
अपनी मिट्टी से मेरा आज भी जुड़ाव है,
माँ के साथ भी दिल से रिश्ता है,
ये उसके चेहरे पर दिखता है,
कभी पानी में कागज की नांव चलाते थे,
आज जीवन की नांव चला रहा हूँ,
मैं कितना बदल गया हूँ माँ,
हर दिन खाने में नकल उतारता था,
हर घड़ी बस माँ-माँ पुकारता था,
मैं कितना बदल गया हूँ(main kitna badal gaya hoon)माँ,
*      *         *        *         *
creater-राम सैणी
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