पिता की सीख (pita ki seekh)

पिता की सीख (pita ki seekh) : मेरी मस्ती

इस कविता को star दीजिए
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*        *        *         *
मैं पैसा खुलकर उड़ाऊंगा हर रोज,
जब तक पिता कमाता है,
घर की सब जिम्मेदारियां,
जब तक पिता उठाता है,
मुझको भी मालूम है ये सब-कुछ है अपना,
पिता के रहते मुझको पूरा करना है हर सपना,
हाथ सर पर रखकर जब वो प्यार जताता है,
मैं अनसुनी कर देता हूँ आवाज उसकी,
जब वो मुझे बुलाता है,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*    *        *        *         *
मैं ना जानु ये लाड़-प्यार,
ये सब पुराने खिलोने हैं,
मैं हूँ अपनी मर्जी का मालिक,
ये सब रिश्ते अनजाने हैं,
मेरी हर ख्वाहिश पूरी करना,
ये पिता की जिम्मेदारी है,
जो पेट ना पाल सके परिवार का,
ये एक पिता की लाचारी है,
मैं परिंदा आसमान का उड़ना मेरा काम है,
मैं हूँ एक लम्बी रेस का घोड़ा,
रूकना ना मेरा काम है,
मेरे आगे झुकते हैं सर मैं जहाँ भी जाता हूँ,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*      *        *        *         *
पिता डराता है मुझको पर माँ गले लगाती है,
मुझको भी पता है माँ हर ताले की चाभी है,
मैं साथ पाकर माँ का,
और तेज दौड़ने लगता हूँ,
मेरे पास है खजाने की चाबी,
ये सोचकर मैं ओर ऊँचा उड़ने लगता हूँ,
जब पिता मुझे जोर जोर से डांटता है,
बात करें आँखें दिखाकर,
माँ हमारे बीच में खड़ी हो जाती है,
हर बार ले जाती है मुझे बचाकर,
माँ का सहारा है मेरा औजार,
हर बार मै इसे ही आज़माता हूँ,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*       *        *        *         *
 पिता की सीख (pita ki seekh) : मेरी राहें

                         
पिता है माँ के आगे बेबस,
माँ बेबस है मेरे आगे,
जब तक मिलेगा माँ का सहारा,
भाग रहेंगे मेरे जागे,
मैं मांगता नहीं पिता से कभी,
माँ बिन मांगे दे देती है,
पिता मुझ पर जब भी चिल्लाता है,
माँ मुझे आगे से भगा देती है,
वो मुझे जब भी समझाता है प्यार से,
मैं उसकी बातें हवा में उड़ाता हूँ,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*         *        *        *         *
बेबसी अपने दिल की,
एक पिता बताए तो किस को ,
माँ प्यार लुटाए उस बेटे पर हद से ज्यादा,
मैं सुधारना चाहत हूँ जिस को,
मैं दिल से चाहता हूँ उसका भला,
जो ग़लत रास्ते पर है चला,
ना जाने कब मेरा हाथ बंटाएगा,
वो ईमानदारी से,
कब तक भागेगा वो अपनी जिम्मेदारी से,
मेरे प्यार का नाजायज़ फायदा,
वो हर रोज उठाता है,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
मै दी हुई पिता की सीख (pita ki seekh) से,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*         *        *        *         *
बच्चों की ख्वाहिशें पूरी करना,
एक अलग बात है,
उनको अपनी जिम्मेदारी का,
एहसास कराना एक अलग बात है,
जब तक नहीं बहाएंगे पसीने की बूंदें,
वो पैसे की कीमत समझ ना पाएंगे,
परिवार की जिम्मेदारी अपने काधों पर,
फिर कैसे उठाएंगे,
मेहनत के बिना जीना क्या,
पिता के पैसे पर जीना क्या,
ये बातें मैं उसको हर रोज सिखाता हूँ,
पिता कमाता है मैं मौज उड़ाता हूँ,
मै दी हुई पिता की सीख (pita ki seekh) से,
हर घड़ी नजरें चुराता हूँ,
वो जोड-जोडकर रखता है पैसा,
मैं खुलकर हर रोज उड़ाता हूँ,
*      *        *        *         *
creation- राम सैणी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Scroll to Top