मौन,तपस्वी पिता (moun tapasvi pitah) : एक मसीहा
मुख से जो भी निकला है वो पूरा किया है, पर्वत से भी ऊँचा जिसका हौंसला है , मौन,तपस्वी पिता […]
मुख से जो भी निकला है वो पूरा किया है, पर्वत से भी ऊँचा जिसका हौंसला है , मौन,तपस्वी पिता […]
कच्चे घरों की दास्तान ( kachche gharon ki dastan ), मुझे सुनाओ बड़ी माँ अपनी जुबान, सच में मिट्टी की
जब बेटी के हाथ पीले होंगे, रस्म आएगी विदाई ( vidaai ) की, नयन मात-पिता के भीगे होगें, जब
मीठी-मीठी बातों से बचकर रहना, वक्त कैसा भी हो हंसकर रहना, हर किसी पर एतबार ना कर, बेटी को
माँ बांट लिया है जमीन का कोना-कोना, बांट लिया हैं घर का सारा सामान, बाग-बगीचे और ऊँचा आसमां, सबके चेहरे
मेरे पापा हैं सबसे धनवान, बड़ी माँ तुम क्यों रहती हो परेशान, मुझे नहीं सिखना है चूल्हा-चौका ( chulha chounka
ये सारा जहान है सूना, हर ऊँचा मकान है सूना, सूना रहेगा ये नीला आसमां, आंगन वीरान है घर सुनसान
खिल-खिलाकर हंसते रहना, अपने से बड़ों को जी-जी कहना, मेरी माँ का बड़ा प्यारा व्यवहार है, पिता का नर्म
फिर से दे मुझे माँ रोटी का रोल ( roti ka role ) बनाकर, मिट्टी के चुल्हे पर गोल-गोल
आँखों पर काले घेरे हैं, साफ-साफ दिखती है चेहरे की थकान ( chehre ki thakan ) , रंग गोरा ऊंचा