(ghar ki chhat aur maa-bap )

घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ):सच्चा सहारा

Last updated on March 22nd, 2026 at 05:50 pm

इस कविता को star दीजिए

घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
आज के रंग बदलते ज़माने में ,
ये ही है जीवन की सच्चाई ,
हर घर में सहते है माँ-बाप,
अपनी औलाद की बेवफाई,
मात-पिता के जैसे घर की छत भी करे रखवाली,
घर की छत आँधी सहे तुफ़ान सहे,
और तपती धूप की मार वो खाएं ,
खुद सह लेगी मार मौसम की पर,
छत के नीचे रहने वालों को,
मौसम की मार से बचाए,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
गर्मी की सहती मार वो,
पर सबको गर्मी से बचाए हर बार वो,
सर्दी को सहकर खुद सीने पर,
छत के नीचे रहने वालों को,
वो सर्दी से राहत दिलाए,
मात-पिता के जैसे घर की छत भी,
अपना फर्ज निभाए,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
मात-पिता भी अपना हर पल वार दें बच्चों पर,
जब तक हैं जान में जान,
जीवन अपना वार देते है सारा,
संभाले रखते हैं पूरे घर की कमान,
इन दोनों के बिना लगे अधूरा संसार,
मात-पिता के जैसा मिलता नहीं कंही प्यार,
औलाद को देते है फूलों-सा जीवन,
खुद काँटों से भरा राह चुनते हैं,
हमारी खुशियों के लिए,
माँ-बाप ना चाहते हुए भी,झुकते हैं,
खुद के चेहरे से रौनक चुराकर,
हमारे चेहरे पर रौनक सजाएँ,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *

घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ): जिंदगी की छांव,

 

(ghar ki chhat aur maa-bap
(ghar ki chhat aur maa-bap

हमारा हाथ थामकर रखते हैं हर सुख-दुख में,
हालातों से लड़कर सदा,
जीवन हमारा संवारकर,
पूरी उम्र गुजार देते हैं ,
हमें समझकर अपना सहारा,
अपने जीवन का हर पल,
किया है नाम हमारे,
मात-पिता हैं हमारे जीवन में,
दो चमकते सितारे,
सितारों के जैसे चमक कर,
घर में रौशनी फैलाएं,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
जब घर की पुरानी छत हो जाए,
वो शोर बहूत मचाए,
ना‌ रोके वो आँधी-तुफान,
ना‌ ही बारीश से बचाए,
दोनो की कुर्बानी का मोल ना जाने कोई,
घर की छत और मात-पिता का,
आखिर में हाल भी एक जैसा हो जाए,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
फिर एक दिन डालकर छत न‌ई,
पुरानी को कचरे का ढेर बताएं
मात-पिता से बच्चे भी एक दिन,
ऐसे ही आँखें चुराएं,
बात-बात पर ताने देकर,
उनके मन को ठेस पहुंचाएं,
इस दुनिया के मेले में,
दोनों बैठकर सोच रहे अकेले में,
जिनके लिए वार दिया जीवन सारा,
अब वो ही हाथ छुडाएं,
घर की छत और माँ-बाप (ghar ki chhat aur maa-bap ),
दोनों एक-सा जीवन पाएं,
माँ-बाप का दर्द होता है क्या,
यहाँ रिश्तों की अहमियत किसको है पता,
सारी उम्र करें रखवाली,
आखिर में वो बोझ कहलाएं।
*       *        *       *
Creater- राम सैणी
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