एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
तुम्हारा बचपन बीता जाएगा धीरे-धीरे,
कभी पढ़-लिखने में,कभी मौज-मस्ती में,
ये नहीं आएगा फिर से लौटकर,
जब से तुम ने चलना सिखा है,
अकेले घर से बाहर निकलना सिखा है,
तुम हर घड़ी व्यस्त रहने लगे हो,
दोस्तों संग मस्ती हर रोज,
कभी सर पर पढाई का बोझ,
अब तुम धीरे-धीरे बड़े हो रहे हो,
चलो फिर से चुस्कियां लेकर पीते हैं,
चलो फिर से चुटकियां बजाकर पीते हैं,
अपने-अपने मन की सुनाते हैं एक साथ बैठकर,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
* * * * *
मैं हर बार बोल देता था,
नए-नए कहानियों का पिटारा खोल देता था,
माँ आज नहीं कल पीयेगे,
कभी स्कूल का होमवर्क करना होता था,
कभी दोस्तों संग बाहर घूमने जाना होता था,
मैं बचपन को अपने तरीके से जी रहा था,
मनचाहा खा रहा था मनचाहा पी रहा था,
खुद में कुछ ज्यादा ही मस्त था,
सच में कितना हसीन वक्त था,
माँ की बातों को हवा में उडा देता था,
हर कोई ना कोई बहाना बना देता था,
मैं माँ को समय नहीं दे पा रहा था,
उसे बडा दुख होता था ये जानकर,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
* * * * *
एक दिन माँ ने मेरे सर पर हाथ रखकर बोला,
बेटा आज ट्यूशन पर मत जाना,
थोडा जल्दी घर आ जाना,
आज़ मैं स्पैशल चाय बनाऊंगी,
गरमागरम पकोड़े भी खिलाऊंगी,
आज़ मना मत करना,
तुम्हारे साथ बैठकर चाय पीने का ,
आज फिर से मेरा मन है,
माँ चली गई रसोई में इतना बोलकर,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
तुम्हारा बचपन बीता जाएगा धीरे-धीरे,
कभी पढ़-लिखने में,कभी मौज-मस्ती में,
ये नहीं आएगा फिर से लौटकर,
* * * * *
मेरे साथ बैठकर चाय पीना,
माँ को शायद इसमें ख़ुशी मिलती थी,
मेरा भी नादान मन था,
इसमें मेरी भी क्या ग़लती थी,
मैं मोबाइल चलाने में व्यस्त था,
सूरज भी हर रोज की तरह,
अपने वक्त पर हो रहा अस्त था,
माँ बिन बोले अपने कमरे में चली गई,
शायद उसे मेरी खुशी ज्यादा पसंद थी,
वो कुछ उखड़ी-उखड़ी सी रहती थी,
उसके कमरे में रोशनी जल रही थी मंद-मंद सी,
आज फिर मैंने वो खुशी के पल,
शायद माँ से छीन लिए थे,
उसके प्यार की गवाही दे रहा था,
हमारे आंगन की मिट्टी का कण-कण है,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
* * * * *
एक कप चाय (ek cup chay) और ढेर सारी बातें : चाय के बहाने प्यार

माँ ने कोई धन-दौलत नहीं मांगी थी,
कुछ पल मांगे थे खुशी के,
मैं जब रात को खेल-कूद कर घर लौटा,
मैं उसके कमरे में धीरे से गया,
मैंने देखा लकडी के मेज पर,
दो चाय के कप रखे हुए थे,
पास जाकर देखा तो एक कप खाली था,
दुसरा मेरे आने का इंतजार कर रहा था,
माँ सो चुकी थी बांई करवट लेटकर,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
तुम्हारा बचपन बीता जाएगा धीरे-धीरे,
कभी पढ़-लिखने में,कभी मौज-मस्ती में,
ये नहीं आएगा फिर से लौटकर,
* * * * *
अगले दिन सुबह वो मेरे कमरे में आई,
मुझे उठाया पकड़कर मेरी कलाई,
वो जाने लगी थी चाय रखकर,
मैनै माँ को रोका बांह पकड़कर,
तुम क्यों मेरे साथ बैठकर चाय पीना चाहती हो,
तुम क्यों मेरी राह देखती रहती हो,
माँ बोली मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर,
मेरे माथे को प्यार से चूमकर,
अब तुम हर दिन बड़े हो रहे हो,
जवानी की दहलीज पर कदम रखने जा रहे हो,
पहले पढ़ाई फिर नौकरी में ,
तुम मगन हो जाओगे,
एक दिन शादी होगी फिर बच्चे आ जाएंगे,
फिर मेरे सोने के बाद तुम्हारा घर में आना होगा,
जब मैं सुबह सोकर उठूंगी तो,
तुम्हारा घर से जाना होगा,
मेरा तुम्हारे साथ बैठकर चाय पीना,
फिर कभी-कभी ही होगा,
ये तुम्हारा बचपन भी कहीं खो चुका होगा,
मुझे बुढ़ापा घेर लेगा,
तुमहारा बीत जाएगा बचपन है,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
* * * *
ये बातें सुनकर मैं देखता रह गया,
माँ के मासूम चेहरे को,
मैं झट से माँ से लिपट गया,
मजबूत कर लिया अपनी बांहों के घेरे को,
मुझे उस दिन समझ में आया की,
हमारा बचपन सिर्फ हमारा नही होता है,
हमारे साथ-साथ माँ का भी होता है,
क्योंकी कुछ दिन के बाद,
ना तो हमारा ये बचपन रहेगा,
ना ही माँ का ये इंतजार करना,
दोस्तों जब भी माँ साथ बैठकर,
चाय पीने को बोले तो पी लिया करो,
कुछ पल सकून के जी लिया करो,
माँ के आगे दिल का हर राज
रख दिया करो खोलकर,
एक कप चाय (ek cup chay) पीने का आज मेरा मन है,
आओ पीते हैं बेटे एक साथ बैठकर,
* * * * *
creater-राम सैणी
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