(ek prarthana har roj)

एक प्रार्थना हर रोज (ek prarthana har roj) : आस्था का दीप

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मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
हर दिन बच्चों का मन हम कैसे बहलाएंगे,
मैंने सुला दिया है बच्चों को ये बोलकर की
रोटी लेकर ईश्वर के फरिश्ते आएंगे,
छप्पन भोग की लालसा नहीं है,
बस हर दिन भरपेट मिल जाए,
ज्यादा कुछ जानने की जिज्ञासा नहीं है,
बस बच्चों के चेहरे पर एक मुस्कान आ जाए,
बूरा नहीं करती हूँ,ना ही बुरा सोचती हूँ,
ईश्वर की मार का हर घड़ी खौफ करती हूँ,
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,
*          *         *          *          *
बच्चों को भूखे पेट सुलाना,बहुत मुश्किल है,
उनका मन बहलाना,बहुत मुश्किल है,
भूखे पेट मन बहुत शोर मचाता है,
हम चाहे कितने भी छुपा लें ,
अपने जीवन के दुख-तकलीफ,
चेहरा मन का भेद बतला देता है,
अपने बच्चों के मुरझाए हुए कोमल चेहरे,
हे ईश्वर,मैं नही देख सकती हूँ,
मैं खुद झुठे भ्रम में रह सकती हूँ,
लेकिन अपने बच्चों को हर दिन,
मैं झूठा दिलासा नहीं दे सकती हूँ,
वो मुझसे लिपटकर सोते हैं,
उनके हर रोज भूखे पेट होते हैं,
मै उनके मन बहलाने का दिखावा,
ना चाहते हुए भी हर रोज करती हूँ,
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
*          *         *          *          *
वो जब भी आधी रात में आँखें खोलते हैं,
मुझसे लिपट कर एक ही बात बोलते हैं,
माँ,ईश्वर के फरीशते आ ग‌ए क्या,
हमारे लिए खाना लाए हैं क्या,
बस आते ही होंगे,मैं ये ही बोलती हूँ,
अभी कुछ ही देर में,दरवाजा खोलती हूँ,
ईश्वर के फ़रिश्ते आते ही,
हमारा दरवाजा खटखटाएंगे ‌,
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
हर दिन बच्चों का मन हम कैसे बहलाएंगे,
मैंने सुला दिया है बच्चों को ये बोलकर की
रोटी लेकर ईश्वर के फरिश्ते आएंगे,
*          *         *          *          *
आजकल के बच्चे भी ना जाने,
कैसे-कैसे सवाल करते हैं,
न‌ई-न‌ई बातों का जाल बुनते हैं,
मेरे पास भी उनके सवालों का,
कोई ठोस जवाब नहीं होता है,
मैं जन्म देने वाली माँ हूँ,
मेरे चेहरे पर कभी भी,
झूठ का नकाब नहीं होता  है,
मेरा मंझला बेटा थोडा शैतान है,
वो बोलता है कहाँ तुम्हारा भगवान है,
हम लोगों से तो लड सकते हैं,
लेकिन माँ भूख से नहीं,
क्या ये उसका अत्याचार नहीं,
वो अमीर आदमी की बांह तो पकड सकते हैं,
लेकिन किसी लाचार की नहीं,
मैं कुछ पल सोचकर बोलती हूँ,
फिर उसके कोमल चेहरे की ओर देखती हूँ,
वो भुखा उठाते जरुर हैं लेकिन सुलाते नहीं,
तभी दरवाजे पर  कदमों की आवाज होती है,
एक प्यारी सी जादुई आवाज आती है,
बहन जी,दरवाजा खोलो,खाना लेकर आई हूँ,
आप सबके लिए,
बारीश में भीगते हुए आई हूँ,
आप सबके लिए,
अपने बच्चों को खाना खिला दीजिए,
मेरे बेटे को दुआएं दीजिए,
ईश्वर को प्रणाम करो झुककर,
जिसकी कृपा से हम ये खूबसूरत खाना ख‌एंगे,
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
हर दिन बच्चों का मन हम कैसे बहलाएंगे,
*          *         *          *

 छोटी सी एक प्रार्थना (ek prarthana) : प्रार्थना में विश्वास (ek prarthana har roj)

 

(ek prarthana har roj)
(ek prarthana har roj)

आज उसका जन्मदिन था,
सब मेहमानों को आना था,
कुछ ही आ पाए हैं,बारीश की वजह से,
सारा खाना बच गया है,बारीश की वजह से,
ये खाना तो ऐसे ही बेकार हो जाएगा,
किसी गरीब का आज भला हो जाएगा,
अच्छा मैं चलती हूँ,कल फिर मिलती हूँ,
चलो जो भी हुआ ठीक ही हुआ,
मैंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया,
मैंने बच्चों से कहा,सर पर हाथ रखते हुए,।
वो भुखे उठाते जरुर हैं,
लेकिन कभी भी भुखे नहीं सुलाएंगे,
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
हर दिन बच्चों का मन हम कैसे बहलाएंगे,
*          *         *          *          *
खुश हुए सब बच्चे भरपेट खाकर,
सब बच्चों ने धन्यवाद किया ईश्वर को,
अपने-अपने हाथ उठाकर,
सब हैरान थे ईश्वर का चमत्कार देखकर,
सब हैरान थे मेरा विश्वास देखकर,
बच्चे लिपट ग‌ए मुझसे बेल-पत्र की तरह,
वो सबकी सुनता है एक मित्र की तरह,
उसके सहारे के बिना हम सब,
जीवन की पतवार को कैसे पार लगाएंगे,
मैं एक प्रार्थना हर रोज करती हूँ,
ईश्वर की खोज हर रोज करती हूँ,
हर दिन बच्चों का मन हम कैसे बहलाएंगे,
मैंने सुला दिया है बच्चों को ये बोलकर की
मैं एक प्रार्थना (ek prarthana har roj) हर रोज करती हूँ,,
*          *         *          *          *
Creater- राम सैणी
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