बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
जहाँ गुजारा है बचपन हंसते-खेलते,
उस आंगन का मोह छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
पता ही नहीं चला कब,
बचपन पंख लगाकर उड गया है,
पता ही नहीं चला कब,
गुड्डे-गुड़ियों से खेलना छूट गया,
ऐसे जान से प्यारे रिश्तों से,
एक पल में मुंह मोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
बेपरवाह,बेलगाम क्या हंसी वक्त था,
रिश्तों में अपनापन,जुबां में मीठापन,
जीवन का हर पल एकदम मस्त था,
ना वक्त की कोई पाबंदी थी,
ना आने-जाने पर कोई रोक-टोक,
ये मेरा ये तेरा नहीं होता था,
बड़े सीधे-सादे होते थे सब लोग,
जो भी पल मिलते थे खुशी के,
हंसकर बटोर लेते थे,
हर सुबह-शाम गाँव की गलियों में,
सब सखी-सहेलियां मिलकर शोर मचाते थे,
ये यादें अपने दिल से मिटाना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
बड़ी माँ की छडी को छुपाकर रख देते थे,
बड़ी माँ के बिस्तर पर नंगे पांव चढ़ जाते थे,
बड़ी माँ बोलती रहती थी,
बिन रुके पुराने रेडियो के जैसे,
ठंडी हवाओं से मुंह फटा रहता था,
किसी औरत की फटी एड़ियां हों जैसे,
जान से प्यारी सखी-सहेलियों से,
नाता तोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
घर बाबुल का छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
जहाँ गुजारा है बचपन हंसते-खेलते,
उस घर का मोह छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
माँ की बातों को हवा में उडाते थे,
वो हर दिन ऐसे ही बोलती है,ये मानकर,
धूप में मत घूमना,ज्यादा दूर मत निकलना,
पिता जी हर घड़ी में ही समझाते थे,
हमारी दुनिया गुड्डे-गुड़ियों से शुरू होती थी,
नोंक-झोंक चलती रहती थी सखियों संग,
एक -दुसरे के घर में खा लिया करते थे,
माँ ढूंढती रहती थी घर-घर जाकर,
हम लोग रखते थे खुद को छिपाकर ,
माँ का कान पकड़कर ले जाना,
हाथ छुड़ाकर फिर भाग जाना,
ये पल भूल जाना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * *
बाबुल का आंगन (baabul ka angan) : बेटी चली नए संसार

हर रोज करते थे माँ को तंग,
खंभे की तरह बड़े हो रहे थे,
लेकिन दिमाग से अभी भी बच्चे थे,
बिना मतलब के अक्ल के घोडे दौड़ाना,
चेहरे पर दो-दो नकाब चढ़ाना ,
ये सब नहीं जानते थे,
एकदम भोले,एकदम सच्चे थे,
माँ के पल्लू को पकड़ कर चलना,
माँ के उस पल्लू को छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
बड़ी माँ के साथ तो हमारा,
छत्तीस का आंकड़ा चलता था,
जब भी हम पैसे मांगते थे तो,
पैसे बचाने का उनके मुख से ज्ञान निकलता था,
हम भी इतनी आसानी से मानने वाले कहाँ थे,
हर बात पर शैतानी,हर बात पर छेड़खानी,
जहाँ हवा भी नहीं पहूंचती थी,
हम सब सहेलियां पहुंच जाते वहाँ थे,
हर दिन खेलते थे,खेल खो-खो का,
सखियों संग खेलने का हमें बडा ही मोह था,
ये सखियों को मोह छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
छोटी-छोटी बातों पर मुंह फैलाना,
कुछ पल एक-दूसरे के घर नहीं जाना,
गुस्सा रफूचक्कर हो जाता था,
हमारा श्याम ढलने से पहले ,
अगली सुबह फिर से गिले-शिकवे भूल जाते थे,
घर से निकलने से पहले,
नए घर में डेरा जमाना,
बचपन की यादों को भूलाना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है,
बाबुल का आंगन (baabul ka angan)छोड़ना एक बेटी के लिए,
इतना भी आसान नहीं है ,
* * * * * *
Creation- राम सैणी
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