जब पिता कमाकर लाता था,
हम हर रोज गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
आज पता चला है पिता जी,
आप ठंडी रोटी कैसे खा लेते थे,
आज पता चला है पिता जी,
आप हर बात पर सर क्यों झुका लेते थे,
आपके साये में खर्च करते थे दिल खोलकर,
आज बहुत महसूस होता है पिता जी,
जब हाथों से पैसे जाने लगे हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हम हर रोज गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
हर बात पर माँ रोकती थी,
नखरे मत कर,चुपचाप खा लो,
कुछ लोगों को ये भी नशीब नहीं होती है,
वो आँखों में आँखें डालकर बोलती थी,
ये सब ज़ुबान का खेल है बेटे,
चाहे तो इससे कड़वा बोलो या,
मीठा बोलकर अपना बना लो,
ये हर आदमी की अपनी-अपनी तहज़ीब होती है
अपने पिता की ओर देखो,
उन्हें प्यार से सब लोग गली-मोहल्लों में,
किस्मत का धनी बुलाने लगे हैं ,
जब पिता कमाकर लाता था,
हर रोज हम गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
जी भर के जी लो इन पलों को,
ये सुनहरे पल हैं जीवन के,
मात-पिता के रहते हुए,
सुलझालो उलझे हुए तार अपने मन के,
इस रोटी का स्वाद पता चलेगा,
जब खुद से कमाने लगोगे,
ये जीवन और भी निखरने लगेगा,
जब तुम अकेले चलोगे,
हमें चिंता रहती है हर घड़ी,
इसलिए तुम्हें समझाने लगे हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हर रोज हम गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
हर दिन जिद्द करते थे हम,
घर में छोटी-छोटी बातों पर,
पिता हमे मनाकर रोटी खिलाते थे,
जब रोटी होती थी उनके हाथों पर,
वो हमारी हर जिद्द पूरी करते थे,
हमारे हर सपने को साकार,
वो कैसे भी करेगा,कंही से भी करेगा,
हार कर नहीं बैठेगा,हमारा पालनहार,
पिता को साथ देखकर हर दिन,
हम मन में नए-नए सपने बुनाने लगें हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हर रोज हम गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
पिता की गर्म रोटी(garam roti) में प्यार : पिता का अमूल्य प्यार

पिता हमारा मिनी बैंक हुआ करता था,
जब जी चाहा अपना शौंक पूरा किया,
उस वक्त हमारा मन आसमान छूआ करता था,
आज भूल गए हैं सब-कुछ,
चाँद-सितारों के शौंक रखने वाले,
ना जाने कब बचपन बीत गया है,
हम थे,पिता के कांधे पर दुनिया देखने वाले,
पिता किस मसीहे का नाम है,
आज हम सबको बताने लगे हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हम हर रोज गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
बिन शर्तों के खींचता है पिता,
हमारी जीवन की पतवार को,
बिन रूके रूके, बिना झुके लेकर चलता है,
अपने साथ सारे परिवार को,
मिट्टी में गिरते हैं जब उसके पसीने के मोती ,
उस मिट्टी से उगा लेता है परिवार के लिए रोटी,
घर की छत पर बैठकर पिता,
रात को तारों से बातें करता है अकेले में,
वो हमारा सच्चा हमदर्द है,
जीवन के इस मेले में,
पिता के दिखाए रास्ते पर चलकर,
हम भी जीवन की गाड़ी चलाने लगे हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हर रोज हम गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
सच में,हमारी जीत का हकदार पिता है,
हम सबकी प्रीत का हकदार पिता है,
सच के पथ पर चलने वाला है,
मेहनत के रथ पर चलने वाला है,
हर घड़ी ईश्वर का आभार जताता है,
वो थामकर रखता है हाथ सदा,
जो सच के रास्ते पर चलता है,
अब तो हम भी पिता के जैसे,
अपनी घर की चौखट को ,
चूमकर जाने लगे हैं,
जब पिता कमाकर लाता था,
हम हर रोज गर्म रोटी (garam roti)खाते थे,
आज हम खुद कमाने लगे हैं,
लेकिन रोटी भी ठंडी खाने लगे हैं,
* * * * * *
Creater -राम सैणी
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