दहेज नहीं शिक्षा दो माँ (Dahej nahin shiksha do maa)
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मैं हूँ मात-पिता के सर का ताज ( sar ka taaj ), मेरा हर फैंसला है लाजवाब, वो जिसके हाथों
मै ढूंढता नहीं ईश्वर को बाहर, उसकी मूरत मेरे घर में ही रहती है, मैं छू लेता हूँ चरण उस
मुझे भेजना घर ऐसे जहाँ, बेटी का सत्कार हो, हर आँख का रहूँ मैं तारा बनकर, घर में सब मुझको
अनाथ-आश्रम और वृद्ध-आश्रम को, यदि एक कर दिया जाए, इसी बहाने बच्चों को माँ और, माँ को बच्चे मिल जाएं,
माँ,मेरे सपनों में पंख लगा दो आज, मै भी पहनना चाहती हूँ कामयाबी का ताज, बेटी समझकर पैरों में ना
हम हार जाएं तो वो फिर से जीता सकता है , माँ के बाद हमारा सच्चा हमदर्द, सिर्फ पिता ही
तस्वीर छू कर माँ की, आंसू बहाने का क्या फायदा, जीते जी निभा लेता अगर तूं, माँ की सेवा करने
छूकर तस्वीर तेरी ( chhookar tashvir teri ) मैं टूट जाता हूँ , मेरी आँखें छलक जाती हैं कंई बार
सबसे प्यारा नाम है माँ, सच्चे प्यार की पहचान (sachhe pyar ki pahchan ) है माँ, राम जाने वो कब