माँ के होते हुए कोई हवा मुझे छू जाए ,
ऐसी हवा कभी चली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
मेरा कवच बनकर रहता है,
हर घड़ी मेरी माँ का आँचल,
मुझे हर मुश्किल से बचाता है,
हर घड़ी मेरी माँ का आँचल,
माँ की तरह मुझ पर मरने वाली,
ऐसी भोली सूरत मुझे दुसरी कोई मिली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
मेरे धूल भरे नन्हे-नन्हे पाँव को,
माँ अपने उजले आँचल से साफ कर देती है,
हर गलती को आखरी मानकर,
नसीहत देकर मुझे माफ कर देती है,
जब नाराज होकर मैं छिप जाता हूँ,
वो मुझे ढूंढती है घर के हर कोने में,
मैं झट से जाकर लिपट जाता हूँ माँ से,
मुझे बहुत आनन्द आता है,
माँ को अपने पीछे-पीछे भगाने में,
फिर माँ भी झूठ-मूठ का स्वांग दिखाती है,
पीठ घुमाकर बैठ जाती है मुझसे नाराज होकर,
मैं भी माँ को मना लेता हूँ,
अपने झूठे आंसू दिखाकर,
हर सुबह माँ का चेहरा देखे बिना,
आज तक मेरी आँख खुली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
मीठी-मीठी नींद मुझे घेरने लगती है,
माँ की लोरी की गूंज सुनकर,
सारे जहां से हसीन सपने,
वो मेरे लिए लेकर आती है चुनकर ,
पीपल की छाँव में,हमारे छोटे से गाँव में,
जहाँ मेरी चर्चा ना हो,
ऐसी कोई गली ही नहीं,
माँ के होते हुए कोई हवा मुझे छू जाए ,
ऐसी हवा कभी चली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
माँ हर रोज चींटियों को आटा डालती है,
जब मैं उस आटे को छू लेता हूँ,
वो हर रोज चिड़ियों के लिए पानी रखती है,
जब मैं उस पानी में हाथ डाल देता हूँ,
जब भी हमारे गाँव में हाथी की सवारी आती है,
माँ आज भी मुझे बचपन की तरह,
उसकी सूंड के नीचे से निकालती है,
ये कैसा अनोखा रुप है ईश्वर का,
ना दिल में कोई नफ़रत ना कोई छलावा है,
वो मेरे हाथों में बांधकर रखती है,
लाल रंग का एक रेशम का कलावा है,
हर दीवार पर मेरी मुस्कराती हुई तस्वीर होती है,
घर की कोई भी दीवार खाली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
माँ का शक्तिशाली आँचल(shaktishali aanchal) : भगवान का आशीर्वाद

माँ के होंठों पर जो प्रार्थना रहती है,
उस प्रार्थना में सिर्फ मैं ही मैं होता हूँ,
वो मुझे देखकर मन ही मन मुस्कराती है,
जब मैं चमकनी नींद में सोता हूँ,
मेरे शरीर का ताप जब बढ जाता है,
उसके दिल की धड़कन भी बढ जाती है,
मेरे स्वस्थ होने की कामना करती है,
वो मेरी चारपाई के पास ही बैठी रहती है,
वहाँ से एक पल के लिए माँ हिली भी नहीं,
माँ के होते हुए कोई हवा मुझे छू जाए ,
ऐसी हवा कभी चली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
वो आज भी मंदिर की सीढ़ियों पर,
हर सुबह अपना माथा रगडती है,
जब गलती से भी मुझे कोई कुछ कह दे,
माँ उस पर बिजली की तरह कडकती है,
कोई कंकड़-पत्थर मुझे लग तो नहीं गया,
मेरे पाँव को छूकर देखती रहती है,
मैंने आज खाना खाया है या नहीं,
वो मेरे पेट पर हाथ फेरकर देखती रहती है,
वो आज भी तडफ उठती है,
मेरी एक छींक आ जाने से,
वो मुझे आज भी मना करती है,
भारी-भरकम बोझ उठाने से,
हमारे आंगन में बरगद के पेड़ पर,
मेरे नाम से बांधें हैं धागे,
कोई डाली छूट गई हो माँ से,
ऐसे कोई बरगद की डाली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
मेरा नाम भी शुरू होता है,
माँ के पहले अक्षर के नाम से,
मेरी मन की हर इच्छा पूरी हो,
वो कहती हैं हाथ जोड़कर,
अमृत वेले में हर सुबह राम से,
माँ के साये में मुझे किसी चीज की कमी ही नहीं,
माँ के होते हुए कोई हवा मुझे छू जाए ,
ऐसी हवा कभी चली ही नहीं,
माँ के शक्तिशाली आँचल (shaktishali aanchal)को भेदकर,
कोई धूप मुझे एक पल के लिए भी छू जाए,
ऐसी धूप अभी तक खिली ही नहीं,
* * * *
Creater -राम सैणी
Read more sweet poetry
Click here–> कैसे बाँटोगे बलिदानी माँ ( kaise bantoge balidani maa )
Click here–> एक तोहफा ( Ek tohfa ) आपके लिए : मेरे पापा



