maa ka sansar

माँ का संसार (maa ka sansar): बेटा और बेटी

 

मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
जब घर में पड़े बेटे के कोमल कदम,
खुशी से फूले नहीं समा रहे थे हम,
बेटी ने मारी जब पहली किलकारी,
उसकी देखकर सूरत प्यारी,
दिल में होने लगी हमारे छम-छम,
बेटी को भी हवा में उछालते हैं हम,
जब भी बेटे को हवा में उछाला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *
बेटी जन्मे चाहे बेटा जन्मे,
दोनों के जन्म के समय,
मैंने दर्द सहा है एक बराबर,
परवरिश एक सी,प्यार एक सा,
दोनों को सुलाया है देकर एक ही चादर,
मुझे जितना दुख होता है,
बेटे का उतरा हुआ मुख देखकर,
उतना ही दुख होता है,
बेटी के पांव में देखकर छाला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *
घर में जो कायदा-कानून बेटी के लिए था,
बेटा भी उसी पर चला है,
जितना आया है बेटे के हिस्से,
बेटी को भी उतना ही मिला है,
जिस दिल में बेटे का वास है,
जो दिल बेटे के लिए धड़कता है
उसी दिल में बेटी के प्यार का सूरज निकलता है,
जिस मुख से निकली हैं बेटे के लिए दुआएं,
उसी मुख से बेटी पर भी दुआओं का रंग डाला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *
मैं सदा बेटे की परछाई बनकर रही हूँ,
उसकी भलाई के लिए,
मैंने बेटी को भी कली बनाकर रखा है,
बेटे की सूनी कलाई के लिए,
बेटे पर वारी है जान अपनी तो,
बेटी को भी नाजों से पाला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *

 माँ का संसार (maa ka sansar): दोनों ही मेरी पहचान

 

maa ka sansar
maa ka sansar

मैंने बांहों के झूले में जैसे बेटे को झुलाया था,
धीरे-धीरे जैसे बेटे को बोलना सिखाया था,
मैंने अपना वो ही आँचल,
अपनी बेटी के लिए भी फैलाया था,
रोते हुए बेटे को चुप किया था,
मैंने अपने गले से लगाकर,
बेटी को भी बांहों में जकड़ा था,
रोती हुई को उठाकर,
बेटे के हाथों में बांधें थे काले धागे,
उसकी नजर उतारने के लिए,
मैंने एक काला धागा बेटी के पाँव में भी बांधा था,
उसको हर बुरी बला से बचाने के लिए,
बेटे को खिलाए थे जिस तरह छोटे-छोटे निवाले,
अपनी बेटी को भी खिलाया वैसे ही निवाला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *
जिस लोरी पर बेटे का अधिकार है,
जितना मेरी आँखों में बेटे का सत्कार है,
मेरी उन्हीं आँखों में बेटी के लिए प्यास है,
बेटी है मेरी आँखों की ज्योति,
बेटी लि‌ए खुले इस दिल के द्वार हैं,
मेरी नज़र में बेटा है चाँद का टुकड़ा,
तो बेटी फुलों की माला है,
मैंने बेटे को आँचल में छूपाकर पाला है,
तो बेटी को भी अपनी जान से ज्यादा संभाला है,
मैं कैसे कहूं मुझे एक से प्यार है,
दोनों ही माँ का संसार (maa ka sansar)है,
माँ के लिए दोनों ही घर का उजाला हैं,
* * * *
creation -राम सैणी
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