चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
* * * * * * * *
बड़ी माँ छड़ी लेकर बैठ गई खुले आंगन में,
मेरा हाथ पकड़ कर अपने पास बिठाया,
सबसे पहले प्रणाम किया आसमान को,
फिर छूकर आंगन की मिट्टी को,
अपने माथे पर लगाया,
बड़ी माँ बोली मेरे सर पर हाथ रखकर,
ऐसे ही होती थी हमारी सुबह की शुरुआत,
मीठी चाय पीते थे मीठी करते थे बात,
हम आज के जैसे पापा-पापा नहीं करते थे,
बड़े प्यार से बुलाते थे पिता जी,
लडना -झगडना तो ना के बराबर था,
हाथ जोड़कर माफी मांग लेते थे,
अगर हो जाए कोई खता भी,
प्यार ही प्यार होता था सबके मन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
* * * * * * * *
गलत व्यवहार ना करते हैं ना सहते हैं आज तक,
लिखना-पडना भी खेलते-कुदते हो गया था,
उस वक्त में हमारा पाँच तक,
हम गुड्डे-गुड़ियों से खेला करते थे,
अपनी सखी-सहेलियों के साथ,
थोड़ा सा रुठ जाने पर कट्टी कर लेते थे,
फिर कुछ वक्त आपस में नही करते थे बात,
हम सब मिल-बांटकर खाते थे एक ही बर्तन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
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बड़ी माँ आप गर्मी की रातों में कैसे सोते थे,
उस वक्त में आज के जैसे,
ज्यादा हवा के साधन नहीं होते थे,
तूं बड़ी भोली है मेरी चुटकी,
एक मीठे संतरे की गोली है मेरी चुटकी,
बड़ी माँ मुझे प्यार करते हुए बोली,
हम-सब भाई-बहन मिलकर,
खुले आंगन में सोया करते थे,
मेरी माँ हाथ वाले पंखे से हवा करती थी,
जब हम रात को रोया करते थे,
माँ का सारी-सारी रात जागना,
हम सबको कहानियां सुनाना,
उस वक्त ये ही सब था चलन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
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चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) : मन के भेद खोलो

दो बहनों से मैं हूँ छोटी,
थोड़ी हंसमुख थोड़ी सी मोटी,
हम-सब भाई-बहन बचपन में,
बहुत मीठा खाया करते थे,
जब हमारे पिता जी खुद गुड पकाया करते थे,
हम खूब खाते थे आलू उबाल-उबाल कर,
पकते गुड में कच्चे आलू डालकर,
सर पर दुपट्टा डालकर रखते थे,
एक दम रहते थे सादेपन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
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मैंने बड़ी माँ को बोला फिर एक बार,
दोनों हाथ जोड़कर किया नमस्कार,
थोड़ा और बोलो ना, मन की परतें खोलो ना,
बड़ी माँ ने थोड़ी और आगे की अपनी चारपाई,
मुझे देखकर फिर से मुस्कराई,
मैंने बोला बड़ी माँ उस वक्त में,
आप कैसे करते थे मनोरंजन,
क्या उसके लिए भी लगता था धन,
राम भला करे उस वक्त रहते नहीं थे,
हम-सब घर की चार दीवारी में अकेले-अकेले,
हर गाँव हर शहर में लगते थे रंग-बिरंगे मेले,
लंगर लगते थे खाने-पीने के लिए,
मस्त रहते थे राम के भजन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
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खाना-पीना सब सस्ता हुआ करता था,
मेले में आना-जाना हम-सब का,
एक-एक सप्ताह हुआ करता था,
बैल-गाडियों में जाया करते थे,
गीत राम नाम के गाया करते थे,
हम थकते नहीं थे पैदल घूम-घूमकर,
हम पैसे को रखते थे होंठों से चूम-चूमकर,
मैं कभी किसी से नहीं डरी थी,
ईश्वर की भक्ति मन में भरी थी,
जो बसा है इस धरती के कण-कण में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
मुझे एक-एक किस्सा सुना डालो,
जो छुपाकर रखा है अपने मन में,
कुछ गाकर बताओ कुछ शर्माकर,
कुछ हाथ उठाकर गगन में,
चलो बड़ी माँ ( chalo badi maa ) लौट चलते हैं आज बचपन में,
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creater- राम सैणी
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