( budape me roti)

बुढापे में रोटी ( budape me roti) : बचपन के संस्कार

मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
बचपन में खेल-खिलौनों के साथ,
बच्चों में संस्कारों का बीज डाल दीजिए,
बुरी आदत और बुरे विचारों को,
बचपन में ही उनके मन से निकाल दीजिए,
मात-पिता ने सब ऐश्यो-आराम,
आज किए हैं आपके नाम,
बुढ़ापे में ये सब लौटाना है आपका काम,
मात-पिता को बुढापे में सहारा मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
जीवन के अनमोल पल वार दिए हैं,
हमने बच्चों पर हंसते-हंसते,
जीवन के सब सुख त्याग दिए हैं,
हमने बच्चों के लिए हंसते-हंसते,
बच्चों का बचपन सुरक्षित रहेगा,
तभी तो हमारा बुडापा सुरक्षित होगा,
बच्चे होते हैं कीमती गहनों के जैसे,
इनकी साज-संभाल में,
अब जीवन गुजारना होगा,
मात-पिता को बुढापे में भरपूर प्यार मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
मै तो पिता हूँ मेरा क्या है,
बच्चों की मुस्कान ही हमारे जीने की वजह है,
हमारे लहू का रंग एक दिन जरूर रंग दिखाएगा
सही-गलत की पहचान बच्चों को जरूर कराएगा
हमारा धर्म हम निभा रहे हैं ,
जीवन की गाड़ी मिलजुल कर हम चला रहें हैं,
बुढ़ापे में चैन के पल मिलना,
औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
मेरा दूध दौडता है उनकी रग-रग में,
मात-पिता से महान नहीं होता कोई इस जग में,
मैंने कोई कमी नहीं छोड़ी है उनके प्यार में,
ये मुझको पता है पूरा है एतबार,
हमारा हर दिन गुजरेगा खुशगवार,
मैंने अपनी परम्पराओं से,उन्हें जोड़कर रखा है,
उनकी जुबां में शहद मैंने घोलकर रखा है,
बुढ़ापे में औलाद का छडी बनकर रहना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *

बुढापे में रोटी ( budape me roti) : परवरिश की जीत

 

( budape me roti)
( budape me roti)

मुझे माँ बनने का सौभाग्य मिला है,
ईश्वर की कृपा से चमकते मोतियों की,
हमें फिक्र नहीं है बुढ़ापे में रोटियों की,
मैंने जिन बीजों को सींचा है अपने दूध से,
वो ही हमें छाँव देंगे,
जिनके चेहरे पर सदा मुस्कान छाई रहती थी,
वो ही बच्चे हमारे चेहरे पर मुस्कान देंगे,
अपने दिए संस्कारों पर मुझे पूरा भरोसा है,
मैंने किए हैं जो हर दिन उपवास,
बाकी ईश्वर की मर्जी है,
सुख-दुख मिलना सब किस्मत के खेल हैं,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
पोते-पोतियों के साथ खेलने का सपना,
अपने दिल में लिए फिरता है हर पिता,
ये अनमोल पल कौन गंवाना चाहेगा,
बच्चों संग बच्चा बनना,
उनके प्यारे चेहरे देख-देख कर हंसना,
ये अनमोल पल कौन गंवाना चाहेगा,
ईश्वर करे ये सुनहरे दिन,
हर माता-पिता के जीवन में आए,
कभी उनको बाहों में झुलाए,
कभी काँधें पर बिठाए,
बुढ़ापे में बच्चों के संग बच्चा बनकर खेलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
उनके चेहरे फुलों के जैसे खिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
बच्चे होते हैं पिता का छावा,
बच्चे होते हैं मोतियों की माला,
ये ही है अच्छे संस्कारों की पहचान,
जिस घर में हो बुजुर्गों का सम्मान,
उस घर की मिट्टी को चूम लेना,
जिस घर में बुजुर्गों के चेहरे पर चमकते हों,
खुशियों के सितारे,
जहाँ बुजुर्गो के पाँव में झूकते हों सारे,
उस घर की चौखट को चूम लेना,
जिस घर की ‌चौखट के अंदर,
प्रेम की हरी-भरी बेल है,
मात-पिता को बुढापे में सहारा मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
मात-पिता को बुढापे में रोटी ( budape me roti) मिलना,
ये औलाद का नहीं संस्कारों का खेल है,
* * * * *
creations –राम सैणी
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