मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ,
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
घर में एक बहन जो मुझ से छोटी है,
जब भी वो रोती है ,
माँ दौड़ी -दौडी आती है उसको गले लगाती है,
मेरी गुड़िया कह-कहकर उसको चुप कराती है,
कभी उसके माथे को चुमे,
कभी हंसकर गले लगाती है,
हर बात पर उसको बोले,
बस तूं ही मेरी जिंदगानी है,
बस तुम हो इन नयनों का काजल,
घर में तुम ही सबसे शयानी हो,
ऐसा व्यवहार देखकर घर में,
में तिल-तिल करके मरती हर रोज हूँ,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ,
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
जब वो चलती है कभी नंगे पैर,
माँ अपने दुपट्टे से उसके पैरों को करती है साफ,
वो दिन मे हजार गलतियां करती है,
माँ फिर भी उसे कर देती है माफ,
उसे रखता है सारा घर -परिवार ,
अपने कांधों पर सवार,
मेरे नसीब का भी मिलता है,
शायद उसको भरपूर प्यार ,
ना जाने क्यों लगती है पूरे परिवार को,
वो ही फूलों की सेज है,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
कोई प्यार करे ना एतबार मुझ पर,
मेरी बड़ी माँ के सिवा,
बस वो ही एक हमारे घर में,
जो मुझे बनाकर रखती है,
अपनी आँखों का दीया,
बड़ी माँ सोती है मुझे सुलाकर,
मुझे गोद में उठा लेती हैं अपनी बांहें फैलाकर,
जिस दिन बड़ी माँ चली जाती है अंदर -बाहर,
उस दिन कोई नहीं देखता मुझे मुस्कराकर,
ऐसे लगता है सारा घर जैसे कोई घना वन हो,
कोई नहीं सोचता मेरे लिए,
शायद मेरा भी दुखता मन हो,
बड़ी माँ को छोड़कर घर में,
मैं सबसे रहती नाराज हूँ,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) : मैं हार नहीं मानूँगी

मैं किसे बोलूं किसे सुनाऊं दुख अपने मन का,
कोई नहीं एहसास कराता मुझे अपनेपन का,
पापा हंसकर टाल देते हैं,
कभी -कभी हवा में उछाल देते हैं,
मैं जिस दिन रूठकर बैठ जाऊं,
पापा कभी -कभी मुझे थपकी देकर सुलाते हैं,
जिस दिन मैं कच्ची नींद से उठकर बैठ जाऊं,
मैं अनजान लोगों से मिलने को,
सदा करती परहेज हूँ,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
मुझे घर में सब बोलते हैं पड़ने के लिए,
लिखना-पढना मुझे भाता नहीं है,
माँ बोलती हैं साथ-सुथरी बनकर रहो,
लेकिन मुझे वो भी शायद आता नहीं,
मैं रहती हूँ अपनी मस्ती में,
कोई नफ़रत से देखें या प्यार से,
मैं खुश हो जाती हूँ एक छोटे से उपहार से,
छोटी सी अपनी दुनिया है,छोटे हैं सपने सारे,
बड़ी माँ हर शाम को अपने सामने बैठाकर,
दीए की बाती से मेरी नज़र उतारे,
मैं दिमाग से बहुत तेज हूँ,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
मैं खाना खाती हूँ तीन वक्त
पर थोड़ा-थोड़ा करके,
मैं पूरे घर में खेलती रहती हूँ सीना चौड़ा करके,
सबका मेरे लिए व्यवहार देखकर,
मुझे कभी-कभी तो बहुत बुरा लगता है,
एक पल के लिए तो सब-कुछ अधूरा लगता है,
बड़ी माँ मुझे मोतीचूर के लड्डू भी खिलातीं है,
क्योंकी मुझे खाने में अच्छा ,
पीले लड्डुओं का चुरा लगता है,
बड़ी माँ के साथ मैं करती मौज हूँ,
मुझे कोई प्यार नहीं करता है,
चेहरा देखकर सबका पता चलता है,
ये सब देखती मैं हर रोज हूँ,
जो भी आता है मुझे सुनाता है,
बात-बात पर आँखें दिखाता है,
क्या मैं घर में अनचाही बेटी (anchahi beti) हूँ
क्या मैं सच में बोझ हूँ,
* * * *
Creater- राम सैणी
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