कंश की कारावास में श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm )
भगवान श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) भारत के पौराणिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक घटना है। धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक संदर्भ में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) कंश की कारावास मथुरा में हुआ, जहाँ उनके माता देवकी और पिता वासूदेव कंस के अन्यायपूर्ण शासन के कारण कैद में थे। इस सच्ची घटना में न केवल उस परमात्मा का चमत्कार देखने को मिलता है, बल्कि यह भी दिखाया गया है कि अधर्म और अन्याय के अंधकार में भी सत्य और धर्म का प्रकाश कैसे प्रकट होता है।
कंस का असहनीय अत्याचार और देवकी-वसुदेव की कैद
कंस मथुरा का एक क्रूर राजा था । जो अपनी बहन देवकी से अत्यधिक स्नेह करता था। लेकिन जब उसने एक दिन रथ मे देवकी और वासुदेव के साथ जाते हुए रास्ते में आकाशवाणी सुनी कि उसकी बहन देवकी का आठवाँ पुत्र उसका वध करेगा, तो उसका स्नेह भय में बदल गया। उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया और बेड़ियों से जकड़ दिया । ताकी उनकी संतान को जन्म लेते ही मार सके।
कंस ने देवकी के छह नवजात बच्चों की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। देबकी की छह संतानों के बाद सातवीं संतान शेषनाग के अवतार बलराम थे, जिन्हें योगमाया की कृपा से वासूदेव की पहली पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया गया। इसके बाद, श्री कृष्ण के रूप में आठवीं संतान का जन्म कंश की कारावास में हुआ।जो अधर्म और अन्याय के अंत का संदेश लेकर आए।
इस घटना से हमें यह शिक्षा मिलती है की
सच्चाई की चमक हमेशा कायम रहती है। सच्चाई कुछ वक्त के लिए छूप तो सकती है पर मिट नहीं सकती है ये ही सच है।
श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) और चमत्कार
अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और आधी रात का समय जब घना अंधेरा छाया था, तब श्री हरि ने भगवान श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया। जैसे ही वे प्रकट हुए तो कंश की कारागार में दिव्य प्रकाश फैल गया। श्री कृष्ण ने अपने माता देवकी और पिता वासूदेव को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दिया और उन्हें बताया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्मे हैं।

उसी समय, कारागार के द्वार एक-एक करके स्वयं ही खुल गए।
पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए और लोहे की बेड़ियाँ एक-एक करके स्वयं ही टूट गईं। वसुदेव ने भगवान श्री कृष्ण को एक छोटी सी टोकरी में रखा और उन्हें गोकुल ले जाने के लिए यमुना नदी की ओर बढ़े। उस समय मूलाधार वर्षा हो रही थी, यमुना नदी का पानी बड़ी तीव्र वेग से बह रहा था।तब शेषनाग ने अपने फन से श्री कृष्ण के उपर छाया की। यमुना जी ने उनके चरण स्पर्श करने के लिए जल को विभाजित कर दिया।
कृष्ण का गोकुल आना और बदली गई कन्या
वसुदेव जी ने गोकुल पहुंच कर श्री कृष्ण को नंद बाबा और यशोदा के घर में रखा, जहाँ माता यशोदा ने एक प्यारी सी कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव उस प्यारी सी कन्या को लेकर कंश की कारागार लौट आए। जब कंस के पहरेदारों ने कंश को सूचना दी कि उनकी बहन देवकी ने एक संतान को जन्म दिया है, तो वह तुरंत उसे मारने के लिए पहुँचा। जैसे ही उसने नवजात कन्या को उठाया तो वह देवी योगमाया के रूप में आकाश में प्रकट हो गईं और कंस को चेतावनी देते हुए बोली उसका संहारक श्री हरि अवतार जन्म ले चुका है।
एक आध्यात्मिक संदेश भगवान श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm )
श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य और धर्म कभी नष्ट नहीं होते। हमें यह भी सिखाता है की कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा जरूर करते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने आगे चलकर गीता का उपदेश दिया और धर्म की पुनर्स्थापना की।
इस सच्ची घटना का सार
श्री कृष्ण का जन्म ( shree krishna ka janm ) की कथा केवल एक धार्मिक गाथा नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक संदेश भी है। हमें ये भी बताता है कि जब अन्याय और अधर्म चरम सीमा पर पहुँचते हैं, तब ईश्वर अवतार लेकर स्वयं धरती पर आते हैं और धर्म की रक्षा करते हैं। कंश की कारागार में जन्म लेकर और कठिनाइयों से गुजरते हुए भी उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि सत्य की सदा जीत होती है। भगवान श्री कृष्ण का जीवन और शिक्षाएँ आज भी समस्त मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।
जय श्री कृष्ण